Collegium System क्या है?
Collegium System भारत में जजों की नियुक्ति (Appointment) और ट्रांसफर (Transfer) का एक महत्वपूर्ण तंत्र है। यह एक Judge-Made System है, यानी इसे संविधान में सीधे तौर पर नहीं लिखा गया है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के माध्यम से विकसित किया गया है।
इस प्रणाली के तहत:
जज ही जजों के नाम की सिफारिश (Recommend) करते हैं
सरकार केवल अनुमोदन (Approve) करती है — कुछ शर्तों के साथ
Collegium का Structure
1-Supreme Court Collegium
सुप्रीम कोर्ट Collegium में शामिल होते हैं:
भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India – CJI)
सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठतम (Senior-Most) न्यायाधीश
ये कुल 5 सदस्य मिलकर सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति का निर्णय लेते हैं।
2-High Court Collegium
हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर के लिए:
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI)
सुप्रीम कोर्ट के 2 वरिष्ठतम न्यायाधीश
यह Collegium हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण पर निर्णय करता है।
Collegium System का इतिहास
Collegium System तीन महत्वपूर्ण मामलों (Landmark Cases) के बाद अस्तित्व में आया:
First Judges Case (1981)
Second Judges Case (1993)
Third Judges Case (1998)
क्या हुआ इन मामलों में?
1993 के Second Judges Case के बाद न्यायपालिका (Judiciary) को नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक शक्ति मिली।
1998 के Third Judges Case में Collegium का ढांचा (Structure) स्पष्ट किया गया।
इसी के बाद वर्तमान Collegium System पूरी तरह स्थापित हुआ।
सरकार की भूमिका क्या है?
Collegium System में सरकार की भूमिका सीमित लेकिन महत्वपूर्ण होती है:
Collegium जजों के नाम की सिफारिश करता है
सरकार पृष्ठभूमि जांच (Background Verification) कराती है
यदि आपत्ति हो तो सरकार फाइल वापस भेज सकती है
यदि Collegium वही नाम दोबारा भेज देता है, तो सरकार को उसे स्वीकार करना होता है
इस प्रकार अंतिम निर्णय की शक्ति न्यायपालिका के पास रहती है।
NJAC विवाद (NJAC Controversy)
साल 2014 में सरकार ने National Judicial Appointments Commission (NJAC) Act पारित किया था, जिसका उद्देश्य Collegium System को बदलना था।
लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने NJAC को असंवैधानिक (Unconstitutional) घोषित कर दिया और Collegium System को पुनः लागू कर दिया।
Collegium System के फायदे
न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Judicial Independence) बनी रहती है
राजनीतिक हस्तक्षेप कम होता है
शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत मजबूत होता है

